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समलैंगिकता पर भड़के रामदेव
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Keep the Gas in the south east corner of the kitchen
 
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 लंदन: मंदिर परिसर में धमाका
 

लंदन. लंदन के हरे कृष्ण मंदिर में धमाका होने से मंदिर के कई हिस्से क्षतिग्रस्त हो गए। इस घटना में कोई हताहत नहीं हुआ है।

यह मंदिर लेस्टर में स्थित है। मंदिर में इसकी स्थापना का उत्सव मनाया जा रहा था। शुरूआती रिपोर्ट में कहा जा रहा है कि इसके किचन में गैस सिलेंडर में विस्फोट हुआ जिसके कारण यह घटना हुई। मंदिर में मौजूद 30 लोगों को सुरक्षित निकाल लिया गया है।

 
   
   

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   साधना बनेगा नं-1-प्रभात डबराल
# प्रभात डबराल से खास बात-चीत
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प्रभात डबराल
 

प्रभात डबराल यानी मीडिया जगत की एक जानी-मानी हस्ती। 57 साल के डबराल इलेक्ट्रानिक मीडिया के एक स्तभं है। कई न्यूज चैनलों का सफर तय करने के बाद प्रभात डबराल इन दिनों साधना न्यूज में एक्जीक्यूटिव डॉयरेक्टर के तौर पर काम कर रहे हैं। इसके अलावा वो सामाजिक-अध्यात्मिक चैनल साधना में को भी अपनी सेवाएं दे रहे हैं। न्यूज चैनल से अलग समाजिक-अध्यात्मिक चैनल की चुनौतियों के बारे में धर्म रिपोर्टर की टीम ने प्रभात डबराल से बात-चीत की। पेश है इंटरव्यू के अंश।

सबसे पहले अपने बारे में बताएं कहां के रहनेवाले हैं,मीडिया में आना कैसे हुआ ?
मैं उत्तराखंड का रहनेवाला हूं। मेरा जन्म 1952 में उत्तराखंड के एक खूबसूरत शहर लैंस डाउन में हुआ। शुरुआती पढ़ाई कोटद्वार से हुई। ग्रेजुएशन मसूरी से किया। ग्रेजुएशन के दौरान ही छात्र राजनीति में आ गया। तभी से लगने लगा कि कुछ ऐसा काम करना है जिसमें मास अपील हो। लिहाजा पत्रकारिता से बेहतर कोई आप्शन मुझे नहीं दिखा।

मीडिया में कॅरियर ग्राफ कैसा रहा ?

शुरुआत अखबार से की लेकिन जल्द ही टेलीविजन माध्यम में आ गया। 1974 में एक जर्मन टेलीविजन चैनल के लिए दिल्ली ब्यूरो में दो -तीन साल तक काम किया। 1977-88 तक नवभारत टाइम्स हिंदी से जुड़ा। 1988 से 1996 तक का समय विशेष संवाददाता के तौर पर दूरदर्शन चैनल के साथ बीता। इस दौरान दूरदर्शन चैनल को प्रोफेशनलाइज करने की प्रक्रिया चल रही थी, जिसमें मैंने भी अपना योगदान दिया। 1996 के बाद खुद का प्रोडक्शन हाउस खोला। आज-तक पहले दूरदर्शन के लिए प्रोग्राम बनाया करता था जिसमें मैंने कंटेंट एडीटर के तौर पर भी काम किया। इसी दौरान सहारा समय ने अपना न्यूज चैनल लांच किया जहां प्रेसीडेंट के पद पर काफी समय तक कार्यरत रहा।

न्यूज चैनल से सीधे धार्मिक चैनल में कैसा अनुभव रहा ?

देखिए, धार्मिक हो चाहें न्यूज, दोनों ही चैनलों की कार्यप्रणाली एक सी है। मसलन, अगर आपको गाड़ी चलानी आती हो तो मारूती 800 चलाइए या फिर मर्सडीज क्या फर्क पड़ता है। हां, धार्मिक चैनल और न्यूज चैनलों में रेवन्यू जुटाने के सोर्स थोड़े अलग, जिसे समझने में ज्यादा दिक्कत नहीं रही।

साधना चैनल का असल मकसद क्या है ?

देखिए, धर्म का संबंध हर हिन्दुस्तानी से है। धर्म के बिना हम रह नहीं सकते है। धर्म के प्रचार-प्रसार में समाजिक-अध्यात्मिक चैनल साधना का बड़ा योगदान है। लेकिन, आप कोई काम तभी कर सकते हैं जब उसके लिए आप के पास धन हो। लिहाजा, साधना चैनल का व्यवसायिक मकसद भी है। लेकिन, असल मकसद तो धर्म-अध्यात्म की सही तस्वीर आमजन तक पहुंचाना है।

न्यूज चैनलों का रुझान इस बीच धार्मिक ख़बरों की तरफ बढ़ा है, इसे आप किस रुप में देखते हैं ?

निश्चिततौर पर लोगों की आस्था धर्म की ओर बढी है। ऐसा सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी है। जहां तक भारत का सवाल है पिछले कुछ दिनों में न्यूज चैनलों के कंटेंट में धर्म ने जबर्दस्त घुसपैठ की है। जिसका नतीजा ये हैं न्यूज चैनलों पर प्राईम टाइम में भी धर्म की खबरों की धूम है। लेकिन, यहां मैं एक बात कहना चाहूंगा की कुछ न्यूज चैनल धर्म की असली तस्वीर पेश करने के बजाय अंधविश्वास को बढ़ावा दे रहे हैं, जिसे किसी भी कीमत पर सही नहीं ठहराया जा सकता।

आप के कहने का आशय क्या है ?

स्पष्ट शब्दों में कहूं तो अगर आप धर्म को उन्माद का साधन बनाते हैं तो ये बिल्कुल गलत है। कुछ न्यूज चैनलों ने धर्म को सनसनी बना दिया है। धर्म का संबंध लोगों की आस्था से है। उनके जीवन पद्घति से है। आप उन्हें धर्म का सही मतलब बताइए। आप तो टीआरपी के लिए लोगों के भीतर धर्म का खौफ पैदा कर रहे हैं। अंधविश्वास को सही साबित करने पर तूले हुए हैं।

आप को क्या लगता है ऐसा कब तक चलेगा ?

ज्यादा दिन नहीं, क्योंकि झूठ के पांव नहीं होते हैं। और बिना पैर के कोई कब तक चलेगा। ऐसे चैनलों को तो दर्शक ही सबक सीखाएंगे। जब लोग ऐसे चैनलों को देखना बंद कर देंगे तो अपने आप इन चैनलों को भी सुधरना होगा।

साधना चैनल पर धार्मिक प्रोग्राम बनाते समय आप क्या ध्यान रखते हैं ?

हमारा प्रयास होता है कि प्रोग्राम में श्रद्घा और आस्था बनी रहे। धर्म और अध्यात्म का सीधा संबंध श्रद्घा और भक्ति से हैं। आप किसी भावना से खिलवाड़ नहीं कर सकते। दरअसल, अगर आप धर्म को पॉजिटिव एनर्जी के रुप में प्रयोग कर रहे हैं तो लोगों का विश्वास आप खुद-ब-खुद जीत लेते हैं।

जो लोग धर्म को प्रोफेशन के तौर पर ले रहे हैं उसके बारे में क्या कहेंगे ?

हमारे मुल्क में विभिन्न धर्म के प्रचार-प्रसार की लंबी व्यवस्था है। अगर लोग धर्म को व्यवसाय के रूप में ले रहे है तो इसमें कोई बुराई नहीं हैं। लेकिन, धर्म के सही चेहरे को दुनिया के सामने लाना उनका पहला मकसद होना चाहिए, ना कि पैसा कमाना।

न्यूज, इंटरटेनमेंट, म्युजिक जैसे चैनलों के बीच धार्मिक चैनल कैसे अपनी टीआरपी को मैनेज कर रहे हैं ?

देखिए, हर चैनल के अपने दर्शक होते हैं। जहां तक धार्मिक चैनलों का सवाल है ये उन लोगों की पसंद हैं जिनके पास टाइम है। जो टीवी को लंबे समय तक वक्त दे सकते हैं।

मतलब, धार्मिक चैनल का दर्शकवर्ग बुजुर्ग तबका है ?

ना... ना... ना... बिल्कुल नहीं। आप मेरी बात को समझ नहीं पाए। मेरे कहने का आशय ये हैं कि धार्मिक चैनल को देखनेवाले वो लोग हैं जिनके पास चीजों को समझने और उसे एनालिसिस करने का वक्त है। ये दर्शक किसी भी एज ग्रुप के हो सकते हैं। ध्यान और योग से जुड़े प्रोग्राम को युवा सबसे ज्यादा देखते हैं। इसे आप क्या कहेंगे।

ऐसा कहा जा रहा है कि रेवेन्यू के मामले में धार्मिक चैनल न्यूज चैनल की तुलना में काफी अच्छी स्थिति में हैं ?

किसने कहा... बिल्कुल नहीं। दोनों चैनलो का सोर्स ऑफ रेवेन्यू एक ही है, विज्ञापन। हां मंदी का जितना असर न्यूज चैनलों पर पड़ा है उतना धार्मिक चैनलों पर नहीं पड़ा।

इसकी क्या वजह है ?

देखिए, मीडिया पर मंदी के असर से मतलब सीधे तौर पर विज्ञापन के कम होने से है। निश्चिततौर पर विज्ञापन कुछ कम हुए हैं। लेकिन, भारत में मीडिया पर मंदी का उतना असर नहीं है जितना हल्ला मचाया जा रहा है। हमारे भी विज्ञापन कम हुए हैं, लेकिन हमने अपने कुछ खर्चों पर लगाम लगाकर उसकी भरपाई कर ली।

मंदी की वजह से मीडिया में नौकरी की संभावनाएं क्या कम हुई हैं ?

ऐसा नहीं है। क्योकि, अगर ऐसा होता तो नए चैनल ना आते।
धर्म रिपोर्टर, टीम
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