केदारनाथ 

 

 भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक दिव्य लिंग केदारनाथ पहाड़ियों के मध्य स्थित है। 3584 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर भारत के मुख्य धार्मिक स्थलों में से एक है। केदारनाथ मंदाकनी नदी की स्त्रोत पर स्थित है। पठार के बीच स्थित होने के कारण अलौकिक केदारनाथ लिंग साल भर बर्फ से घिरा रहता है। ऐसा माना जाता है कि पुरातन काल में इस मंदिर की स्थापना पांडवो द्वारा की गई है। किन्तु 8वीं सदी में आदिशंकराचार्य ने वर्तमान मंदिर परिसर की स्थापना की थी। मंदिर की भीतरी दीवारों पर कई देवी देविताओं और धार्मिक मान्यताओं से जुड़े चित्र देखे जा सकते हैं। और मंदिर के बाहर भगवान शिव के वाहन नंदी की एक विशाल प्रतिमा विराजमान है। भोलेनाथ को समर्पित यह मंदिर 1000 सालों से भी ज्यादा समय से प्राचीन है। मंदिर परिसर में अत्यंत भारी और भिन्न-भिन्न आकारों के पत्थर सालों से इस तरह खड़े हैं मानों किसी ने इन विशाल पत्थरों को ज्यामितीय नमूने को ध्यान में रख कर यहां स्थापित किया हो। यहां शिव के पूजन के लिए एक गर्भ गृह और श्रद्धालुओं के सहूलियत के लिए विशाल मंडप भी मौजूद है। मुख्य भवन में सदाशिव रुपी भगवान केदारनाथ की एक विशाल लिंग स्थापित है।

 

भौगोलिक स्थिति

 

उत्तराखंड के उत्तर काशी जिले में भगवान केदारनाथ का मंदिर है। भारत-चीन सीमा के नज़दीक इस तीर्थस्थल को मंदाकिनी नदी का उदगम माना जाता है।  गढ़वाल के मुख्य दर्शनीय तीर्थों में से एक यह जगह समुद्रतल से 3583 मीटर ऊपर है। सर्दियों में यहां सभी जगह भरपूर बर्फबारी होती है। और गर्मियों में 20 डिग्री से ज्यादा का तापमान यहां कभी नहीं होता। वर्षाऋतु में 150 सेंटी मीटर वर्षा होती है अतः मई से अक्टूबर महीने की बीच यहां भ्रमण करना सबसे उत्तम माना जाता है। केदारनाथ ऋषिकेश से 234 और देहरादून से 250 किलोमीटर दूरी पर है। 

 

धार्मिक मान्यताएं 

 

कुरुक्षेत्र की लड़ाई में अपने वंशजों और रिश्तेदारों की हत्या के पश्चात जब पांडव यहां पश्चाताप करने पहुंचे तो शिव ने उन्हे प्रत्यक्ष रुप से दर्शन नहीं दिए। वो इस स्थल पर एक बैल के रुप में अवतरित हुए। पर भीम ने मवेशियों के झुंड में भी उन्हे पहचान लिया और निचले हिस्से से पकड़ने की कोशिश की तो बैल रुपी शिव का पिछला हिस्सा वहीं छूट गया और बाकी भाग पूरे गढ़वाल में विस्तृत हो गया। शिव के रुप में बैल का कूबड़ भी आगे जाकर अलग हो गया। बैल के शरीर के उसी शंकु के आकार के हिस्से को केदारनाथ के रुप में स्थापित किया गया जो कि पंच केदार के मुख्य स्थल में से एक है।बैल रुपी शिव के शरीर के अन्य चार हिस्से पूरे गढ़वाल में अलग-अलग जगह फैल गए जो कि तुंगनाथ, मध्यमहेश्वर, कपलेश्वप और रुद्रनाथ केदार के रुप में जाने जाते हैं। 
सभी पॉच केदार स्थानों का पूजन पंच केदार के रुप में किया जाता है। 

  चार अन्य केदारनाथ

 

 

 

तुंगनाथ

मध्यमहेश्वर  तुंगनाथ कपलेश्वर रुद्रनाथ

कपलेश्वर के अलावा अन्य तीन केदार मुख्य केदारनाथ से भी काफी ऊंचाई पर स्थित हैं जिसमें से रुद्रनाथ तक पहुंचने का मार्ग बाधाओं से भरपूर लेकिन गढ़वाल का सबसे सुन्दर स्थान माना जाता है। 
 

शिव की भुजा तुंगनाथ में गिरी थी। तुंगनाथ मंदिर 3,680 मीटर की ऊंचाई पर है और पंच केदार में से सबसे ज्यादा ऊंचाई पर स्थित है। हांलांकि चोपटा से सबसे नज़दीक इस मंदिर का मार्ग अत्यंत सरल है।  

रुद्रनाथ -
रुद्रनाथ में शिव के चेहरे का पूजन किया जाता है। यह जगह 2,286 मीटर की ऊंचाई पर है और गोपेश्वर से 23 किलोमीटर दूर है। मंदिर से हाथी पर्वत, नंदा पर्वत, त्रिशुली का बहुत ही मनमोहक दृश्य मिलता है। यहां कई पवित्र कुंड भी मौजूद हैं जिनमें से सूर्यकुंड, चंद्रकुंड और तारा कुंड प्रमुख हैं। रुद्रनाथ की चढ़ाई से 3 किलोमीटर आगे अनुसूईया देवी का मंदिर स्थित है।
   
केदारनाथ के दर्शनीय स्थल
 
 केदारनाथ मंदिर- 
पुरातन काल में इस मंदिर की स्थापना पांडवो द्वारा की गई है ऐसा माना जाता है। किन्तु 8वीं सदी में आदिशंकराचार्य ने वर्तमान मंदिर परिसर की स्थापना की थी। मंदिर की भीतरी दीवारों पर कई देवी-देवताओं और धार्मिक मान्यताओं से जुड़े चित्र देखे जा सकते हैं। मंदिर के बाहर भगवान शिव के वाहन नंदी की एक विशाल प्रतिमा विराजमान है। भोलेनाथ को समर्पित यह मंदिर 1000 सालों से भी ज्यादा प्राचीन है।
आदिगुरु शंकराचार्य समाधि -
केदारनाथ मंदिर के पीछे आदिगुरु शंकराचार्य का समाधि स्थल है। ऐसी मान्यता है कि केवल 32 वर्ष की आयु में चारों धामों की स्थापना कर शंकराचार्य ने यहां शरीर का त्याग किया था।
 

अन्य भ्रमण स्थल

चोराबरी (गांधी सरोवर) (2 किलोमीटर)  
एक छोटी सी झील है जहां से पांडवो के जेष्ठ भ्राता युधिष्ठिर ने स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया था। झील में तैरती बर्फ का नजारा अत्यंत मनभावन है।
 
वासुकीतल(6किलोमीटर)
अलकनंदा नदी के किनारे का समतल स्थल ब्रह्मा कपल कहलाता है यहां हिन्दु अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिए कामना करते हैं।

गौरीकुंड
(14 किलोमीटर) -

 

केदारनाथ के मुख्य यात्रा स्थल पर है यह गौरीकुंड जो मॉ गौरी को समर्पित है।
     
 

सोनप्रयाग
(20 किलोमीटर)

 

यह सोन गंगा और मंदाकिनी का संगम स्थल है यहीं से त्रियुंगीनारायण के लिए मार्ग खुलता है।
      
 

त्रियुंगीनारायण
(25 किलोमीटर) -

 

सोनप्रयाग से 5 किलोमीटर दूर इसी जगह भगवान शिव और पार्वती का विवाह हुआ था। मंदिर के सामने आज भी विवाह की अलौकिक ज्योति के दर्शन होते हैं।
गुप्तकाशी
(49 किलोमीटर) -
भगवान अर्धनारीश्वर और विश्वनाथ के दर्शन करने यहां श्रद्धालु यहां आते हैं।

कैसे पहुंचे केदानाथ

 

केदारनाथ रेल, सड़क और हवाई मार्गों द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है।

सड़क मार्ग - गौरी कुंड से पदयात्रा की दूरी जो ऋषिकेश, कोटद्वार, देहरादून और हरिद्वार जैसे गढ़वाल औऱ कुमांउ क्षेत्र के कई महत्वपूर्ण स्टेशनों से जुड़ा है। 
रेलवे - ऋषिकेश (234 किलोमीटर) 
कोटद्वार (260 किलोमीटर)
हवाई यात्रा- देहरादून (251 किलोमीटर)
 

कुछ आवश्यक सूचनाएं


तापमान-

>>गर्मी -पूरे दिन मौषम ठंड होता है लेकिन रात में ठंड थोड़ी ज्यादा बढ़ जाती है। इसलिए हल्के ऊनी कपड़े साथ ले जाएं।

>>सर्दीयों में-तापमान लगभग शून्य के पास पहुंच जाता हैं और बर्फ पड़ने की भी संभावना होती है। इसलिए ठंड के कपड़े साथ ले जाए।

  भाषा- हिंदी, अग्रेजी, गढ़वाली

यात्रा करने का सही
 समय

मई से अक्टूबर माह के बीच केदारनाथ यात्रा का सही समय होता है।

 

  नोट शरदऋतु के दौरान बर्फबारी के कारण इस तीर्थ का मार्ग अवरूद्ध हो जाता है। गौरीकुंड से मात्र 14 किलोमीटर की दूरी पर केदारनाथ स्थित है।