समलैंगिकता पर भड़के रामदेव
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| Keep the Gas in the south east corner of the kitchen |
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लंदन: मंदिर परिसर में धमाका
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लंदन. लंदन के हरे कृष्ण मंदिर में धमाका होने से मंदिर के कई हिस्से क्षतिग्रस्त हो गए। इस घटना में कोई हताहत नहीं हुआ है।
यह मंदिर लेस्टर में स्थित है। मंदिर में इसकी स्थापना का उत्सव मनाया जा रहा था। शुरूआती रिपोर्ट में कहा जा रहा है कि इसके किचन में गैस सिलेंडर में विस्फोट हुआ जिसके कारण यह घटना हुई। मंदिर में मौजूद 30 लोगों को सुरक्षित निकाल लिया गया है। |
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'पांच नदियों का अनोखा संगम' |
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दुनिया में दो नदियों के संगम तो कई स्थानों पर है जब कि तीन नदियों के दुर्लभ संगम प्रयागराज,इलाहबाद को धार्मिक दृष्टि से अत्यत महत्वपूर्ण समझा जाता है लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि पांच नदियों के इस संगम स्थल को त्रिवेणी जैसा धार्मिक महत्व नहीं मिल पाया है. प्रयाग का त्रिवेणी संगम पूर्णतः धार्मिक मान्यता पर आधारित है
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क्योंकि धर्मग्रन्थों में वहां गंगा तथा यमुना के अलावा अदृश्य सरस्वती नदी को भी स्वीकारा गया है,$ यह माना जाता है कि कभी सतह पर बहने वाली सरस्वती नदी अब भूमिगत हो चली है बहरहाल तीसरी काल्पनिक नदी को मान्यता देते हुये त्रिवेणी संगम का जितना महत्व है उतना साक्षात पांच नदियों के संगम को प्राप्त नहीं हैं.
अरुणमय मधुमय देश हमारा, जहां पहुंच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा... । स्पष्ट है कि शीर्षस्थ छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद ने भारत की श्रेष्ठता का बखान करने के लिए इन पंक्तियों की रचना की होगी। प्रसाद की इन्हीं पंक्तियों के अनुरुप प्रकृति ने इस देश को एक ऐसी भी अनूठी श्रेष्ठता प्रदान की है कि कोई भी अन्य देश उसकी बराबरी तो क्या उससे दो तीन सीढ़ी नीचे तक नहीं पहुंच सका है। और भारत की यह विशेषता है कि यहां दो, तीन, चार नहीं बल्कि पांच-पांच नदियों का संगम होना। पांच नदियों का यह संगम उत्तर प्रदेश में इटावा जिला मुख्यालय से 60 किमी दूर बिठौली गांव में है। जहां पर कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान राज्य के लाखों की तादाद में श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगता है. इस संगम को पंचनदा या पंचनद भी कहा जाता है, यहां के प्राचीन मंदिरों में लगे पत्थर आज भी दुनिया के इस आश्चर्य और भारत की श्रेष्ठ सांस्कृतिक धार्मिक विरासत का बखान कर रहे है. सारे विश्व में इटावा का पंचनद ही एक स्थल है,जहां पर पाचं नदियों का संगम हैं,ये नदियां हैं यमुना, चंबल, क्वारी, सिंधु और पहुज.
800 ईसा पूर्व पंचनदा संगम पर बने महाकालेश्वर मंदिर पर साधु-संतो का जमावेड़ा लगा रहता है। मन में आस्था लिए लाखों श्रद्धालु कालेश्वर के दर्शन से पहले संगम में डुबकी अवश्य लगाते हैं। यह वह देव शनि है जहां भगवान विश्णु ने महेश्वरी की पूजा कर सुदर्शन चक्र हासिल किया था। इस देव शनि पर पांडु पुत्रों को कालेश्वर ने प्रकट होकर दर्शन किए थे। इसीलिए हरिद्वार, बनारस, इलाहाबाद छोड़कर पचनदा पर कालेश्वर के दर्शन के लिए साधु-संतो की भीड़ जुटती है। महत्वपूर्ण यह है कि यह दुनिया का एकमात्र वह स्थान है जहां एक साथ पांच नदियों का संगम है। पंचनदा के नाम से ख्याति अर्जित करने वाली इस तीर्थस्थली के बारे में बेशक लोगों को अधिक जानकारी न हो परंतु यह वह स्थान भी है जहां तुलसीदास ने कालेश्वर के दर्शनोपरांत राम चरित मानस के कुछ महत्वपूर्ण अंशों की रचना की थी। इसलिए श्रद्धालुओं को मानना है कि पचनदा जैसी दूसरी कोई तीर्थस्थली भारत में कहीं अन्यत्र हो ही नहीं सकती है।
पंचनदा पर बने द्वापरकालीन महाकालेश्वर मंदिर को सुदर्शन तीर्थ के नाम से भी ख्याति अर्जित की है। इसी स्थान पर ओम कालेश्वर व महाकालेश्वर दोनों शिवलिंग एक ही स्थान पर स्थापित हैं। जो समूचे विश्व में अन्यत्र कहीं नहीं देखे जा सकते हैं। इसका उल्लेख पूर्ण पुराण के 82 वें अध्याय में मिलता है। जिसकी कथा देवी भागवत में भी देखने को मिलती है। यहां पहले कभी सोवरण मंदिर हुआ करता था जो कलियुग के आरंभ होने के साथ ही पंचनदा के कुंड में चला गया और पुनः पाषाण पूजा में महाकालेश्वर की प्रतिमा प्रकट हुई जो आज इस मंदिर में स्थापित है। इसे देव स्थान की संज्ञा इसी से मिलती है कि यहां ग्वालियर स्टेट के बादशाह को भी नतमस्तक होकर पश्चाताप करना पड़ा और यहां के दैवीय चमत्कार को आत्मसात होते देख बादशाह ने यहां मठ की स्थापना की। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि इतने पावन स्थान को यदि उस प्रकार से लोकप्रियता हासिल नहीं हुई जिस प्रकार से अन्य तीर्थस्थलियों को ख्याति नहीं मिली तो इसके लिए यहां का भौगोलिक क्शेत्र कसूरवार है। यहां तकरीबन दो सौ किमी के दायरे में फैला खतरनाक बीहड़ एवं उसमें पनपने वाले तमाम खूंखार डकैतों के कारण यहां भक्तों की अपेक्षित संख्या नहीं पहुंच पाती। यमुना, चंबल, क्वारी, सिंधु और पहुज के इस संगम स्थल की सुरक्षा के लिए सरकारों ने भी कोई ठोस इंतजामात नहीं किए हैं। चंबल घाटी क्षेत्र में नदियों की गहराई सारे देश की अन्य नदियों से अधिक है। जिसके कारण ही यहां बाढ़ के खतरे कमोवेश कम ही रहते हैं। सरकार की उपेक्षा का ही परिणाम है कि यह स्थान विकास के कार्यों से पूरी तरह से उपेक्षित है।
देश की धार्मिक परंपरा के तहत विभिन्न नदियों की उपासना की जाती है परंतु इस मामले में पतित पावनी गंगा को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। श्रद्धालु गंगा को मोझ का साधन समझते हैं। गंगा नदी के समक्ष अन्य नदियों का महत्व कम ही है। इसी वजह से पंचनद अद्भुत आश्चर्य होने के बावजूद उपेक्षित ही रह गया है। दुनिया में दो नदियों के संगम तो कई स्थानों पर हैं जबकि तीन नदियों दुर्लभ संगम प्रयागराज इलाहाबाद को धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण समझा जाता है लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि पांच नदियों के संगम को त्रिवेणी जैसा धार्मिक महत्व नहीं मिल पाया है। पंचनदा प्राकृतिक सुंदरता में देश के गिने चुने स्थानों में से एक माना जाता है। यहां के मनोरम दृश्य किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर सकते हैं। पचनदा का सबसे उत्तम प्राकृतिक दृश्य तो भरेह के ऐतिहासिक किले से दिखाई देता है। वनों से घिरे इस इलाके का अनुपम दृश्य वर्षा ऋतु में और मनोरम हो जाता है। इसका उदाहरण इसी से लिया जा सकता है कि जो भी इस मनोरम दृश्य को एक बार देख लेता है उसे यह दृश्य हिमालय में किए जाने वाले पर्वतारोहण के समान महसूस होता है।
पंचनद के एक प्राचीन मंदिर को बाबा मुकुंदवन की तपस्थली भी माना जाता है। जनश्रुति के अनुसार संवत 1636 के आसपास भादों की अंधेरी रात में यमुना नदी के माध्यम से गोस्वामी तुलसीदास कंजौसा घाट पहुंचे थे और उन्होंने मध्यधार से ही पानी पिलाने की आवाज लगाई थी, जिसे सुनकर बाबा मुकुंदवन ने कमंडल में पानी लेकर यमुना की तेज धार पर चल कर गोस्वामी तुलसीदास को पानी पिलाकर तृप्त किया था। बाद में रामभक्त महाकवि उनके आश्रम पर रुके और जगम्मनपुर किले के मैदान में उन्होंने भगवान राम की कथा सुनाई थी। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि बाबा की अलौकिक शक्तियां उनकी रक्षा करती हैं जिसका प्रमाण है कि यहां पर कभी भी उपलवृश्ठि नहीं हुई है। इसी के निकट काली मंदिर है जिसमें बाबा के चरण बने हुए हैं जिन पर पान या पांच बताशे रखकर श्रद्धालु माथा टेकते हैं। इस स्थल को विकसित करने की भी योजनायें भी बनाई गई लेकिन खूखांर डाकूओं के आंतक के चलते कोई भी विकास योजना सतह पर प्रभावी नहीं हो सकी.पंचनद बांध बीहड के सपनों में शामिल है। सपना जो सत्ताधारी यहां की जनता को बीते तीन दशकों के दिखा रहे हैं. पंचनद मध्यप्रदेश के भिंड और उत्तरप्रदेश के इटावा, जालौन, औरैय्या जिले की सीमा पर यमुना और उसकी सहायक नदियों चंबल, क्वारी, पहुंच और सिंध का मिलन स्थल है। इस जगह पर ही वह प्रसिद्ध मंदिर है जिसके बारे में कहा जाता है कि तुलसीदास ने यहां प्रवास किया हो। आज तो यह स्थल बीहड़ में अपराध और गरीबी के बीच सांसे ले रही जनता और उपजाऊ होने के बाद भी बेकार पड़ी बीहड़ की जमीन को एक नई जिंदगी दे सकता है। इस बांध पर सबसे पहली योजना 1986 में बनी थी। यहां बांध बनाने की बात इंदिरा गांधी ने कही थी।
पंचनद बांध योजना के तहत उत्तर प्रदेश के औरैया जनपद में यमुना नदी पर औरैया घाट से 16 किमी अपस्ट्रीम में सढरापुर गांव में बैराज का निर्माण प्रस्तावित है। इस स्थल के अपस्ट्रीम में चंबल, क्वारी, सिंध और पहुंज नदियां मिलती हैं। प्रस्तावित पंचनद बांध के डाउन स्ट्रीम में कम से कम 3000 क्सूसेक के डिस्चार्ज अवश्य छोड़ा जाना चाहिए। न्यूनतम 3000 क्यूसेक की क्षमता का जल विद्युत स्टेशन प्रस्तावित किया जाए।
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| नितिन गुप्ता, साफ्टवेयर इंजीनियर |
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